नगरकोट धाम माँ बज्रेश्वरी मंदिर में मकर सक्रांति पर्व घृतमंडल तैयार

 

kangra temple52 शक है माँ ब्रजेश्वरी का ये दिव्य मंदिर। मकर सक्रांति पर्व पुरे देश के साथ-साथ काँगड़ा के नगरकोट धाम में भी मनाया जाता है। मकर संक्रांति के उपलक्ष्य में बज्रेश्वरी देवी मंदिर कांगड़ा में घृतमंडल तैयार कर लिया गया है। गर्भगृह से लेकर प्रांगण तक माँ के दिव्या भवन में माँ के भगतों का ताँता लगा है। इस बीच मंदिर में करीब 25 क्विंटल देशी घी से बनाये गये मखन से माँ की पिंडी पर मखन का लेप लगाकर घृत मंडल तैयार हो गया है। देशी घी को मक्खन बनाने के लिए पुजारियों की टीम पूरी शिद्दत के साथ पिछले 1 हफ्ते से जुटी रही। इस बीच देश – विदेश से भक्तों के यहाँ मकर सक्रांति पर्व में आने का सिलसिला यहाँ जारी है। यहाँ की मान्यता के अनुसार इस मखन के प्रशाद रूप में ग्रहण करके कई बीमारियाँ दूर होती हैं। आज से आठ दिन बाद माँ की पिंडी पर चढ़ाये गये मखन को भगतों को प्राशाद के रूप में बाँट दिया जाता है। – भारतीय सनातन मर्यादा और शास्त्रीय विधान भी कहते हैं कि मकर संक्रांति का पर्व न केवल हमारे पापों को हरने वाला है, बल्कि पारिवारिक सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला भी है। मकर संक्रांति एक प्रकार का मुक्ति दिवस है, हम इसे आध्यात्मिक और भौतिक जगत की मुक्ति से जोड़कर भी देख सकते हैं। मकर संक्रांति को प्रकाश का पर्व भी कहा गया है, क्योंकि सूर्य प्रकाश का प्रतीक है। प्रकाश का तात्पर्य अंधकार रूपी अज्ञानता को दूर करने से है। मकर संक्रांति का प्रकाश समस्त प्राणियों में ऊर्जा व ज्ञान का प्रवाह सुचारू करता है। समूचे उत्तरी भारत में मकर संक्रांति को खिचड़ी के प्रतीक के रूप में भी मनाया जाता है। यह पर्व स्नान पर्व के रूप में भी जाना जाता है। इस पर्व पर गंगा स्नान मोक्ष को प्रदान करने वाला कहा गया है, लेकिन माता बज्रेश्वरी देवी की पावन नगरी में यह पर्व बिलकुल भिन्न तरह से मनाया जाता है। यहां कई क्विंटल देशी घी को कुएं के शीतल जल से 101 बार धोकर मक्खन बनाकर माता की पिंडी पर चढ़ाया जाता है। यह मक्खन एक सप्ताह तक माता की पिंडी पर चढ़ा रहता है। जब एक सप्ताह बाद इस शुद्ध मक्खन को पिंडी से उतारा जाता है, तब इसे लाखों भक्तों को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है, जिसे श्रद्धालु आंखों की बीमारी व चर्म रोगों के उपचार के लिए उपयोग में लाते हैं। कहते हैं कि जब सतयुग में राक्षसों का वध करके माता बज्रेश्वरी विजय प्राप्त करके आईं तो सभी देवों ने माता की स्तुति की थी, उस दिन से मकर संक्रांति का पर्व यहां मनाया जाता है। बतातें हैं कि जहां- जहां देवी के शरीर पर घाव आए, वहां-वहां देवताओं ने मिलकर घृत (घी) का लेप किया। आज भी उस परंपरा को जारी रखते हुए माता की पिंडी पर मक्खन का लेप किया जाता है। – मंदिर के पुजारी महेश कहते हैं कि देसी घी को गर्म करके बड़ी बड़ी परातों में डाल कर ठंडा कर इसको 101 बार धोया जाता है। जिसके पश्चात इसकी पिंडियाँ बनायी जाती हैं। देसी घी को श्रद्धालु चढ़ाते हैं। मकर सक्रांति की रात्रि को माँ को मखन का लेप लगाया जाता है। इसके पीछे एक कहानी है कि एक बार माँ ब्रजेश्वरी देवी का राक्षसों ये युद्ध हुआ, जिसमे माता को युद्ध के उपरात शरीर पर घाव हो गये जिसके बाद माता को मखन का लेप लगाया गया। उसके बाद माँ के जख्म ठीक हो गये। तभी से ये परम्परा शुरू हो गयी।

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Posted by on 14/01/2013. Filed under धर्म संस्‍कृति, समाचार. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.