क्या सिर्फ़ अध्यापक ही दोषी?

हाल ही में राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला गागला में नवीं कक्षा में सभी छात्रों के फ़ेल होने की खबर को पढ़कर खेद तो जरूर हुआ पर बात हैरान कर देने वाली नहीं लगी। खेद इस लिए क्योंकि ऐसा परिणाम अभिभावकों, छात्रों व अध्यापकों के लिए दुखदायी व चंताजनक है। हैरानी इस लिए नहीं हुई क्योंकि मौजूदा प्रणाली व ब्यवस्था के a ji ऐसे परिणाम की संभावना बनी रह सकती है। मैं ये तो नहीं कह रहा हूं कि अध्यापक इस परिणाम के लिए जवाबदेह नहीं हैं, पर ये भी नहीं स्वीकार सकता कि सीधे उन पर ही पूरा दोष मढ़ दिया जाए। वे केवल तभी दोषी हैं यदि उन्होंने वर्ष अपने अध्यापन मेम कोई कोताही बरती होगी। उस शिक्षा प्रणाली व ब्यवस्था की नकामी के लिए किस की जवाबदेही तय की जाए जिसके तहत बच्चा आठवी पास करने के बावजूद भी विभिन्न विषयों का आधारभूत ज्ञान नहीं रखता?
पूरा सत्य तो जांच के बाद ही सामने आ सकेगा, परन्तु कहा जा सकता है कि इस तरह के अवांछित परिणाम के लिए अभिभावकों का भड़क जाना स्वभाविक तो जरूर है, परन्तु जरूरी नहीं कि जायज़ भी हो। ये भी देख लेना लाज़मि है कि क्या पूरे वर्ष इन अभिभावकों ने स्कूल का रुख करके अपने लाडलों की पढ़ाई लिखाई की सुध लेने की कोशिश की या नहीं। अगर उन्हें अध्यापकों की कोताही कहीं नज़र आयी थी तो स्कूल की एस एम सी ने क्या कदम उठाया? यदि एस एम सी या अभिभावकों ने पूरे सत्र भर अपनी इस जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया तो परिणाम आने पर इतनी हाय तौबा व शोर क्यों? वर्ष भर खामोशी व चैन की बांसुरी बजाने के बाद खराब परिणाम आने पर दोष अध्यापको के मथे मढ़ देना न तार्किक है न ही न्यायसंगत। ऐसी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती कि अध्यापकों ने बिना पेपर देखे ही इन्हें फ़ेल कर दिया होगा। क्या ये मान लिया जाए कि अभिभावक ये चाहते हैं कि अध्यापक केवल परीक्षा लेने की औपचारिकता मात्र करें और बिना पर्चा जांचे ही उन्हें पास कर दें? ऐसे आदेश फ़िलहाल शिक्षा विभाग ने अभी तक जारी नहीं किये हैं जो ऐसा करने के लिए अध्यापकों को निर्देशित या वाध्य करते हों।
बहुत सारे जानकारों का मानना है कि माता-पिता अपने बच्चों के पहले शिक्षक होते हैं और घर पहला स्कूल। अपने बच्चों की पीठ पर महज़ बस्ता लाद कर स्कूल भेज देने से ही मां-बाप का फ़र्ज़ पूर्ण नहीं हो जाता। ये भी उनका ही दायित्व बनता है कि जब बच्चा स्कूल से घर लौटे तो उससे पूछा जाए कि आज उसने स्कूल में क्या क्या किया और घर में क्या क्या करना है। अध्यापक का अध्यापन तभी कारगर साबित हो सकता है जब शिष्य ज्ञान को अर्जित करने के योग्य हो या अर्जन करने की चाहत में प्रयत्न करता हो। अध्यापक ज्ञान का भंडार जरूर हो सकता है, परन्तु ये मान लेना कि उसके पास कोई निंजा तकनीक या अल्लादीन का चिराग है उसके साथ नइंसाफ़ी होगा। कहावत है कि आप गधे को कुएं तक ले जा सकते हैं, पर आप उसे लौटे से पानी नहीं पिला सकते।
ऐसा निराशाजनक परिणाम उस भयानक भविष्य की ओर ईशारा कर रहा है जिस ओर ग्रेडिंग व सब पास वाली नेति पर आधारित हमारी शिक्षा बढ़ रही है। ये मेरी निजी व मनघड़ंत राय नहीं है, बल्कि विभिन्न सर्वेक्षणों में ये बात कई बार ज़ाहिर हो चुकी है कि सब पास वाली नीति के चलते छात्र आठवी तो पास कर रहे हैं, परन्तु बहुत सारे विषयों का उन्हें आधारभूत ज्ञान ही नहीं। ऐसा कई राज्यों के मुख्यमंत्री, नेता व शिक्षाविद भी विभिन्न मंचों से कह चुके हैं। एक राज्य के मुख्यमंत्री ने तो आज की शिक्षा प्रणाली पर तंज़ कसते हुए कहा था – आठवी तक कोई फ़ेल नहीं, उसके बाद कोई पास नहीं। जो ज्ञान छात्र ने आठ वर्षों तक हासिल नहीं किया वो एकाएक नवी कक्षा में कैसे आ सकता है? निचले स्तर पर रही कमियों के लिए आखिर नवी, दसवी, ग्यारहवी व बारहवी के अध्यापकों को ही कैसे दोषी माना जा सकता है? प्राथमिक स्तर की नकामियों की जांच क्यों नहीं की जाती? प्राथमिक स्तर पर ये क्यों नहीं जांचा जाता कि छात्र का वास्तव में क्या ग्रेड चल रहा है?
बात एक विद्यालय के परिणाम की नहीं है। ये परिणाम बहुत बड़ी चेतावनी दे रहा है और मौजूदा शिक्षा प्रणाली पर एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाता है। वास्तविकता ये है कि अधिकतर स्कूलों में या तो नवी व इससे अगली कक्षाओं के परिणाम खराब आ रहे हैं या फ़िर जैसे-तैसे उन्हें अच्छा दिखाया जा रहा है। आंकड़ों व गुणवता की इस जदोजहद में न आंकड़ा सही आ रहा है न गुणवता दिखायी दे रही है। ऐसा लगता है कि शिक्षा प्रयोगों के दलदल में उलझ कर रह गयी है।
जब जब भी ऐसे खराब परिणाम आते हैं, अभिभावक, सियासतदां, नौकरशाह सभी की निगाहें अध्यापकों की तरफ़ तरेरी हो जाती है और फ़िर शुरु हो जाता है एक दूसरे पर गलतियों का ठिकरा फ़ोड़ने का संघर्ष। ’मैं न मानूं’ वाली कश्मकश में सबसे ज़्यादा नुक्सान उठाने वाला मुहरा बच्चा बनता है। इसकी टोपी उसके सर वाले इस खेल में अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि ये खेल कब रुकेगा। इतनी इल्तजा जरूर करूंगा:
सिर्फ़ अंधेरों की शिकायत से कुछ नहीं होगा जनाब
ये भी तो देखिए कि रोशनी की मज़बूरी क्या है

 

जगदीश बाली
9418009808

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आप यहां तक पंहुचे आपका आभार। कृपया अपने सुझाव से प्रोत्‍साहित करें।
Posted by on 08/02/2017. Filed under विविध. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.