राष्ट्र्गान का सम्मान हमारा कर्तब्य

30 नवंबर को देश की सर्वोच्च अदादल्त की दो सदस्यों वाली न्यायपीठ ने आदेश दिया कि देश के सभी सिनेमा घरों में किसी भी फ़ीचर फ़िल्म दिखाए जाने से पहले राष्ट्र गान चलाना होगा और साथ ही पर्दे पर तिरंगे को फ़हराते हुए दिखाना होगा। हॉल में उपस्थित सभी लोगों को खड़े हो कर राष्ट्रगान को सम्मन देना होगा। इस दौरान हॉल के दरवाज़े बंद रखने होंगे। एक याचिका के प्रत्युत्तर में 9 दिसंबर को सर्वोच्च अदालत ने अपने इस आदेश को निरस्त तो नहीं किया, परन्तु शारीरिक रूप से खड़े रहने में असमर्थ व्यक्ति को खड़े न होने से छूट ज़रूर दी। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे असमर्थ व्यक्ति को इस दौरान इस तरह से पेश आना होगा जो किसी तरह से राष्ट्र गान का अपमान न लगे। 2011 में उपहार आग त्रासदी मामले में दिये फ़ैसले के संबंध में न्यायपीठ ने स्पष्ट किया कि दरवाजा बंद रखने का मतलब ये नहीं कि इसमें पूरी तरह से कुंडा लगा दिया जाए। इसका मक्सद केवल राष्ट्रगान के दौरान लोगों की आवाजाही को रोकना है। आपको स्मरण होगा कि 3 जून 1997 की शाम नई दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमाहॉल में आग लग गयी थी जिसमें 59 लोग झुलसकर या दम घुटने से मर गए थे जिसके संदर्भ में 2011 में सर्वोच्च अदालत ने सिनेमा घरों के दरवाज़े बंद न रखे जाने के आदेश दिये थे।
सर्वोच्च अदालत के इस फ़ैसले से कुछ बुद्धिजिवी इतफ़ाक नहीं रखते। वे मानते हैं कि यह फ़ैसला तंग राष्ट्रवादी सोच की ओर ईशारा करता है और एक तरह से मौलिक आज़ादी को भी चोट पहुंचाता है। ये वो तबका है जो अधिकारों और आज़ादी की बात तो बढ़-चढ़ कर करता है, परन्तु जब कर्तब्य की बात आती है तो कनि काट जाते हैं। मैं कोई न्यायविद तो नहीं हूं, परन्तु इतना ज्ञान ज़रूर रखता हूं कि जिस संविशान ने हमें अधिकार और आज़ादी दी है, उसी संविधान ने हमारे कर्तब्यों का भी ज़िक्र किया है। राष्ट्र गान और राष्ट्र ध्वज का सम्मान उन कर्तब्यों की फ़ेहरिस्त में अव्वल पर आता है। क्या ये कर्तब्य केवल संविधान के किताबी पन्नों में दफ़न रखने के लिए हैं? राष्ट्र गान और राष्ट्र ध्वज के सम्मान का मतलब है आप राष्ट्र का सम्मान कर रहे हैं। राष्ट्र का सम्मान किसी भी तरह की आज़ादी से बढ़कर होता है। अगर देश का नागरिक इस बात के लिए तैयार नहीं तो अफ़सोस ही किया जा सकता है।
इस फ़ैसले से इतफ़ाक न रखने वाले दलील देते हैं कि देश प्रेम की भावना नागरिकों के अंतर मन से आनी चाहिए। इस बात से मैं भी सहमत हूं, पर इस देश प्रेम की भावना को जागृत करना भी तो कोई अनुचित बात नहीं खास तौर से उस वक्त जब इसे भुलाया जा रहा है। यदि नहीं, तो कल आप ये भी तो कह सकते हैं कि न्याययालयों में ब्यान देने से पहले गीता पर हाथ रख कर सत्य बोलने की प्रतिज्ञा नहीं होनी चाहिए ल्योंकि सत्य और असत्य बोलना तो अंतर मन की बात है। वास्तव में गीता की सौगंध भी सत्य बोलने के लिए प्रेरित करती है। ऐसा नहीं है कि सरहद पर जाकर दुश्मन से टक्कर लेते हुए शहीद होने से ही अपनी देश भक्ति का परिचय दिया जा सकता हैं, पर इतना ज़रूर है कि देश की शान एवं गौरव के प्रतीक राष्ट्र गान को हम खड़े हो कर सम्मान तो दे ही सकते हैं और राष्ट्र ध्वज को सलाम कर हम जय हिंद तो कह ही सकते हैं। मैं ये तो नहीं कहता कि जो खड़े हो कर राष्ट्र गान का समम्मान नहीं करते, वे देश भक्त नहीं या वे जो खड़े होते हैं, केवल वही देश भक्त हैं, परन्तु जो खड़े नहीं होते वे चाहे अनचाहे राष्ट्र का अपमान का गुनाह ज़रूर करते हैं।
कुछ लोग एक दलील ये भी देते हैं कि टैगोर ने जन गण मन… किंग जोर्ज के सम्मान में लिखा था जिस वजह से इसलिए यह देश प्रेम की भावना का प्रतीक नहीं। परन्तु इस इल्ज़ाम से क्षुब्ध हो कर टैगोर ने अपने एक पत्र में इस का खंडन करते हुए कहा था: “मैं केवल खुद को अपमानित ही करूंगा यदि मुझे उन लोगों को जवाब देना पड़े जो ये मानते हैं कि मैं किसी जॉर्ज चतुर्थ या पंचम की शान में गाउंगा…।” खैर इस विवाद पर अलग से बहस की जा सकती है। संविधन में इसे राष्ट्र गौरव का प्रतीक माना है, तो फ़िर संविधन की इस पवित्र डोर में बंधना ही होगा। नहीं तो आप कल ये भी कह सकते हैं कि तिरंगा इस लिए तंग राष्ट्रवाद का प्रतीक हैं क्योंकि इसमें केवल तीन ही रंग है। इस बात में संदेह नहीं कि जन गण मन आज़ादी के पहले से आज तक हमारे मन में राष्ट्र चेतना जगाता रहा है।
कोई किसी से प्यार करता है या कोई किसी का सम्मान करता है, इस बात का पता हमें बात-चीत में इस्तमाल किए जाने वाले शब्दों और ब्यवहार से लगता है। राष्ट्रप्रेम या राष्ट्रसम्मान हमारी भावनाओं का वह अहम पहलू है जिसे दुनिया के सामने आना ही चाहिए अन्यथा कोई भी हमें कमज़ोर समझने लगेगा। राष्ट्र्गान का सम्मान राष्ट्रसम्मान की एक अभिवयक्ति है। स्कूलों या सिनेमाघरों में ही नहीं, बल्कि राष्ट्रगान हर महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी नियमित रूप से गाया जाना चाहिए। राष्ट्र गान के सम्मान में खड़े होना चाहिए या नहीं, यह परीक्षा में पूछा जाने वाला बहु वैकल्पिक उत्तर वाला सवाल नहीं है। इसका एक ही जवाब है – हां। राष्ट्र्गान का सम्मान सबसे अहम अदर्श है जिसका अनुसरण करने के लिए संविधान हमारा आहवान करता है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है:
जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं

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आप यहां तक पंहुचे आपका आभार। कृपया अपने सुझाव से प्रोत्‍साहित करें।
Posted by on 08/02/2017. Filed under विविध. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.