रातरानी का खिला हुआ चेहरा —- कहानी -रतन चंद ‘रत्नेश’

उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि कोई छाती पर बैठा उसकी गर्दन धीरे—धीरे दबाए जा रहा है। आंख खुली तो सांस घुटती नज़र आई और फेफड़े हवा के लिए फड़ाफड़ा रहे थे। उस फड़फड़ाहट से सारा कमरा गूँज  रहा था। पर्याप्त हवा होते हुए भी उसके फेफड़े सांस लेने और छोड़ने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे और उसे अपनी गर्दन की शिराएँ फूलती और नसें फटती प्रतीत हो रही थीं। पीठ पर दाईं ओर एक असहनीय खींचाव का अनुभव पा रहा था वह । उसने अपनी विस्फारित आंखों से अंधेरे में ही इधर-उधर ‘इन्हेलर’ को टटोला पर उसे जहाँ होना चाहिए था, वह वहां नहीं था। उसने कमरे की बत्ती जला दी। इन्हेलर कहीं नहीं था। दिमाग पर जोर डाला। ख्याल आया कि वह उसके काले रंग की पैंट की जेब में है और उसने आज दोपहर बाद ही बस-स्टॉपेज पर बैठकर अपनी सांस में खींचा था।छाती से अजीब-सी आवाज आ रही थी जो अब उसके लिए अजीब और अपरिचित नहीं रही थी। वह बिस्तर से उठा। कमर झुकाए उतारा और खूंटी पर टंगी पैंट को हाथ में दबाए पुनः बिस्तर पर लौट आया।

उसने पैंट की सारी जेबें टटोलीं, पर पर्स और चाबियों के गुच्छे के सिवा वहां कुछ न था। उसने फिर अपने दिमाग पर जोर डाला पर ख्याल नहीं आया कि बस-स्टॉपेज के बाद उसे इसकी जरूरत पड़ी हो। इन्हेलर के न मिलने के कारण कष्ट और अधिक बढ़ गया। यह सोचते ही घबराहट होने लगी कि कल सुबह कैमिस्ट की दुकान खुलने तक तो वह पस्त हो जाएगा। दवा तो थी पर उसे रात में इन्हेलर चाहिए, आराम से सोने के लिए । दवा लेने पर ऐसी अवस्था में कोई विशेष लाभ नहीं होता है।

उसे अपनी सांव उखड़ती-सी लगी। पीठ के पीछे का खिंचाव इतना बढ़ चुका था कि उसे लगा कि उसकी पीठ की हड्डी टूटकर झटके से बाहर आ जाएगी।

वह उसी पैंट को पहनकर घर से बाहर निकल आया। सारा वातावरण शान्त था। कहीं इधर-उधर से बीच-बीच में गाड़ियों की आवाजें आतीं और उनमें लगातार गूंज रही थी उसकी छाती की खरखराहट। वह कमर को थोड़ा झुकाए सांस लेने और छोड़ने का प्रयत्न करता बिल्डिंग के तीसरे माले से नीचे उतर आया और एक रिक्शा  लेकर सरकारी अस्पताल की ओर  चल पड़ा। वहां पहुंचकर जैसे-तैसे इमरजेंसी तक गया। डॉक्टर ने उसके चेहरे की ओर देखा, कयास लगाया और फिर पूछा, ‘‘क्या तकलीफ है?’’

‘‘सांस लेने में…..।’’

इसी बीच डॉक्टर ने ‘अमीनोफाइलिन…. इन्ट्राविनस… वेरी स्लोली’ एक पर्ची पर लिखकर उसे पकड़ा दिया। वह नर्स के कमरे में पहुंचा। ड्यूटी पर मौजूद नर्स ने उसे पहचान लिया। वह हमेशा फूल-सी खिली दिखती है। इस समय रात के दूसरे प्रहर में भी दिख रही है। लिपस्टिक उसी तरह उसके अधरों पर सजी हुई है जिस तरह वह बाजार में साड़ी पहनकर सजी घूमती नजर आती है। वे एक दूसरे को जानते हैं। पहचान का माध्यम यही इंजेक्शन  है जो कुछ ही देर में वह उसकी धमनी में उतार देगी। वह कई बार यहां आकर अपनी धमनियों में इंजेक्शन  की सुई चुभवा चुका है। इत्तेफाक से यही नर्स उसे अधिक मिली है। संभवतः वह ही डॉक्टर से पर्ची बनवाकर उसे ढूंढने लगता है। वह बहुत धीरे-धीरे उसकी धमनी में इंजेक्शन  चुभाकर दवा बूंद-बूंद टपकाती है और शरीर व मन दोनों को ठंडक महसूस होती है। जब तक वह सुई निकालकर उसे लेटे रहने के लिए कहती है, तब तक उसका शरीर तनावमुक्त हो चुका होता है और से बड़ी प्यारी नींद आती है। वह नींद जो उससे जबरन छीन ली गई होती है। जब वह उसके करीब खड़े होकर धीरे-धीरे इंजेक्शन  दे रही होती है, उसे बड़ा अच्छा लगता है — उसके सफेद कपड़े, उसका गोरा रंग और उसके लिपस्टिक-सने लाल होंठ। वह उसे इसलिए भी अच्छी लगती है कि उसे उसकी तकलीफ पर दुःख होता है। एक बार एक अन्य नर्स ने उसे इंजेक्शन  देना चाहा था तो उसकी धमनी से खून की धारा फूट पड़ी थी और उसकी सारी बांह खून से सन गई थी। पर वह नर्स जिसका वह नाम तक नहीं जानता, उसे कोई कष्ट नहीं होने देती। उसने मन ही मन उसका एक नाम भी रख लिया है — उर्वशी।

उसे देखते ही वह मुस्कुरायी। रात की पारी में वह रातरानी-सी खिली और सुगन्ध बिखेरती नजर आती। उसका  जी चाहता कि उसकी सांस भी स्वाभाविक चलती रहे और वह उसे सुन्दरी को लेकर भीड़-भरे बाजार में घूमे, जहां शाम ढलते ही सजे-धजे और अत्याधुनिक फैशन के कपड़ों में लिपटे लोग मौज-मस्ती में घूमते हुए नजर आते हैं। इस बाज़ार में किसी को भी दूसरों को देखने की फुर्सत नहीं होती। सब यही देखते हैं कि कौन  उसे देख रहा है ? युवकों की आशिकाना  नजरें तो हर युवती और  हर महिला पर जा टिकती हैं, चाहे वह उत्तेजक वेश  में हो या फिर साधारण कपड़ों में। वह उर्वशी को भारतीय वेशभूषा में सजाकर  बाजार में घूमना चाहता है। हल्का मेक-अप, लम्बे बालों का जूड़ा, एक सुन्दर-सी साड़ी, बस। भारतीय  वेशभूषा में जो आकर्षण  है, वह आधुनिकता में कहां? वह उसे बाजार में लेकर घूमना चाहता है तब तक, जब तक लोग अपने घरों को लौटना न शुरू कर दें। वह उस फव्वारे के पास उसके साथ बैठकर क्वालिटी की आइसक्रीम खाना चाहता है, जहां कई लोग घेरे में बैठे होते हैं और जहां रात उतरे ही रंग-बिरंगे प्रकाश  में फव्वारा भी रंगीन हो उठता है। वह उर्वशी  के साथ पार्कों में घूमना चाहता है और उसकी आसमान में उड़ने की इच्छा भी हो आती है।

वह अस्पताल में बिस्तर पर अर्द्धनिद्रा में कब तक सोया रहा, उसे भान न हुआ। इस बीच अपने अवचेतन मन में उसने सुन्दरी उर्वशी  के संग बहुत सुखद क्षण बिताए।

वह धीरे-धीरे उठा। श्वास-प्रश्वास  सामान्य थी, पर छाती में अब तक एक बोझ-सा अनुभव हो रहा था। बिस्तर से उतरकर उसने पांव में रबर की चप्पल फंसायी और जाने को हुआ। उसकी नजर बिस्तर पर पड़ी, जहां खून के दाग लगे हुए थे जो उसके नहीं किसी और के थे और सूखकर स्थायी जगह बना चुके थे।
इमरजेंसी वार्ड के अन्दर उसने चारों ओर निगाह दौड़ायी। उसे लेकर कुल चार मरीज उस वार्ड में थे। उनमें से दो दर्द समेत या दर्दरहित नींद में थे। उनके संग आए लोग भी ऊंघ  रहे थे। तीसरा मरीज अकेला था। अस्पताल के लाल कम्बल को उसने दूर फेंका हुआ था  और बायीं करवट लेटा अपना दायां चेहरा अपनी दायीं हथेली पर रखे एक टक उसे देखे जा रहा था। उसे उसका चेहरा बड़ा डरावना लगा। आँखें जैसे बाहर निकली आ रही थीं। वह कराहता जा रहा था। शायद वह भी उसकी तरह इस वक्त अकेला था, इसलिए उसे कष्ट  का अनुभव अधिक ही हो रहा था।
उसने एक बार फिर इत्मीनान से उन मरीजों और उनकी देख-रेख करनेवालों पर नजर डाली और धीरे-धीरे वार्ड से बाहर निकल आया। चारों ओर बीमार-सी शान्ति थी। बीच-बीच में कहीं दूर से किसी-किसी के रहकर खांसने की आवाज आ रही थी। वार्ड से निकलते ही उसकी निगाह पारदर्शी शीशे के बाहर सड़क पर फैली रोशनी और अंधेरे के मिश्रण में जा अटकी। एक पेड़ के नीचे अंधेरे में चार-पांच लोग सिमटे-गुमटे सो रहे थे। पास ही एक रिक्शावाला भी सवारियों की बैठने वाली सीट पर अधपसरा लेटा हुआ था।
उसने मन-ही-मन सोचा, क्या इस गहरी रात में थककर गहरी नींद में सोये उस रिक्शेवाले को जगाने की हिम्मत वह जुटा पाएगा?
उसके पांव ‘सिस्टर्स-रूम’ की ओर बढ़ गए। हल्के खांसते हुए वह अन्दर चला गया। उर्वशी  उस समय उसी तरह रातरानी-सी खिली एक स्वेटर बुन रही थी। वह कुछ घबड़ाया और फिर उदास हो गया। पता नहीं अपने पति के लिए बुन रही है या अपने जैसे किसी प्यारे बच्चे के लिए या कोई मंगेतर भी हो सकता है। उर्वशी ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा और पूछा, ‘‘अब कैसा महसूस कर रहे हैं आप?’’
‘‘ठीक हूं।’’
उसी क्षण उसके मन में दूसरा ख्याल आया। नहीं-नहीं इसकी शादी अभी नहीं हुई है और उसका मंगेतर भी नहीं होगा। उससे कुछ बातें करना चाहता था वह। पूछना चाहता था कि क्या उसकी शादी हो चुकी है? दूसरी सिस्टर एक फाइल से इंजेक्शन  में दवा भर रही थी। वह सिर्फ इतना ही कह पाया— ‘‘छाती में दबाव अनुभव हो रहा है।’’
‘‘कोई बात नहीं। सुबह आकर ओ.पी.डी. में दिखा लीजिएगा।’’
उसने मुस्कुराकर  उर्वशी को अलविदा का संकेत दिया और ‘थैंक यू’ कहकर कमरे से बाहर निकल आया।
अस्पताल से निकलकर जैसे ही वह खुली हवा में आगे बढ़ने लगा  कि उसे अपनी सांस फिर से कुछ-कुछ उखड़ती लगी। वह फिर से अस्पताल के अंदर चला गया। ठीक उसी तरह जैसे जेल से लम्बी सजा काटकर कैदी खुली हवा में आकर घबरा जाता है और फिर से जेल में जाने को इच्छुक हो उठता है।
वह इमरजेंसी वार्ड से बाहर सुनसान कॉरीडोर में आगे बढ़ता गया। कभी दायें मुड़ता तो कुछ आगे चलकर बायें। उसकी आंखें फिर से बोझिल होने लगीं। अन्त में वह अस्पताल के पूर्वी द्वार पर था, पर बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। द्वार पर तीन-चार एम्बुलेंस, कुछ जीप और कारें खड़ी थीं। वह एक बेंच पर जाकर इत्मीनान से लेट गया। इस वक्त किसी को इन बेंचों की जरूरत नहीं है और न ही कोई उसे टोक सकता है। आखिर वह मुश्किल से सांस ले रहा है।
वह सिर के नीचे रबर की चप्पल दबाकर बायीं करवट लेट गया पर उसे कुछ असुविधा हुई। चप्पल निकालकर उसने सिर के पीछे रखा और फिर अपनी बांह मरोड़कर उसका सिरहाना बना लिया। उसे कुछ आराम मिला। सांस भी सामान्य थी। उसे थोड़ी ही देर में नींद आ गई…. एक गहरी नींद। अब वहां उर्वशी नहीं थी, एक शून्य था । शायद सपने भी हों। उसे कभी सपने याद नहीं रहते, न बुरे और न ही अच्छे। हां, कभी-कभी सपनों में उसकी नींद टूट जाती है और उसकी आंखों में आंसू होते। कोई बड़ी रेल-दुर्घटना या विमान का ध्वस्त होना। कई लोगों के एक साथ मरने पर उसे बहुत रोना आता है –हकीकत में भी।
सुबह जब अस्पताल के परिसर में छायादार पेड़ों से चिड़ियों की चहचहाने की आवाजें आने लगीं, तब उसकी नींद टूटी। इक्का-दुक्का वाहन भी अस्पताल में उंघते हुए आ रहे थे। वह उठा, आंखें मिचमिचायीं और पूर्व के प्रवेशद्वार से सड़क पर आ गया। बूढ़े और प्रौढ़ लोग कनटोप, मफलर और स्वेटर पहने सुबह की सैर को निकल रहे थे। उनमें से कुछ के हाथ में छड़ी, बेंत या छोटा डंडा था। कुछ के साथ झबरे कुत्ते भी थे।
उसके बगल से अखबारवाला हैंडल से लटके झोले और कैरियर में दबोचे ढेर सारे अखबारों के साथ सर्र से निकल गया। आजकल समाचार भी ऐसे ही होते हैं, तेजी से बगल से निकलते हुए– उसने मन-ही- मन सोचा।
उसने सड़क के किनारे  बने एक बिना छत के स्टॉप पर आकर एक लगभग खाली बस ली और अपने घर चला आया। उसका चचेरा बड़ा भाई अभी तक लम्बी ताने लेटा हुआ था। दरवाजा उसी तरह भिड़ा हुआ था, जैसे वह रात दस बजे के करीब बन्द करके गया था। ऐसे सुस्त लोगों के घर हवा और धूप भी आने से कतराती है।
अपने साथ वह एक पाव रोटी और पॉलीथिन में बन्द दूध का पैकेट भी  लेता आया था। उसने गैस जलाकर पहले दूध को गर्म किया और फिर अलग से एक गिलास दूध में हल्की-सी चायपत्ती डालकर उसे उबाला। चाय मिले दूध को एक गिलास  में उड़ेलकर वह दो स्लाइस के साथ अपने बिस्तर पर आ गया। इस सुबह के नाश्ते  के बाद उसने  एक ब्रांकोडायलेटर ( श्वास की टिकिया ) ली और बिस्तर पर लेट गया।
अपने बिस्तर पर कितना सुख है? थोड़ी देर के लिए उर्वशी का हंसता—मुस्कुराता सुन्दर मुखड़ा उसकी आंखों के सामने गुज़रा ही था कि अखबारवाला आज का अखबार बन्द दरवाज़े के नीचे से सरका गया। वह अखबार उठाकर सुर्खियां पढ़ने लगा। मुखपृष्ठ पर ही नीचे की ओर शहर के एक पिता द्वारा  अपनी नाबालिग पुत्री के साथ बलात्कार की सनसनीखेज़ खबर थी। खबर कुछ अधिक सनसनीखेज़ इसलिए थी कि पिता एक उच्चाधिकारी था। उसने पन्ने पलटे और अभी तीसरे पृष्ठ पर नगर की अन्य खबरों पर आंखें दौड़ा ही रहा था कि भाई साहब पास वाले कमरे से अपनी चप्पल चटखाते हाजिर हो गए। अखबार के कमरे में सरक आने या उसकी फड़फड़ाहट से शायद उनकी नींद खुल गई थी। सुबह उठकर सबसे पहले चाय और बीड़ी के साथ अखबार देखना उनकी आदत है और यह आदत तब से बनी, जब से वह गांव से उनके पास आया है। उन्होंने आज तक कभी अखबार खरीदकर नहीं पढ़ा। अखबार पर पैसा बर्बाद करने से बेहतर वे बीड़ियों का बण्डल खरीदना समझते हैं। अखबार में भी सिर्फ सनसनीखेज़ खबरें पढ़ने का उन्हें शौक है और किसी सच्ची कहानियों के संवाददाता की तरह उसे मिर्च—मसाला लगाकर लोगों को सुनाते हैं।

उसने आत्मसमर्पण करते हुए उन्हें अखबार थमा दिया। वे उसे अपने कमरे में ले गए और वहीं से चाय का आर्डर दे डाला। उन्हें ये पता नहीं कि रात में उसकी तकलीफ बढ़ गई थी, पर यह पता है कि अब तक वह दूध ला चुका होगा। वह उठकर रसोई में चला गया। वहां चाय बनाते वह सोचने लगा कि यह आदमी जो बदकिस्मती से उसका चचेरा भाई है और उससे लगभग पन्द्रह साल बड़ा भी, कभी उसकी किसी प्रकार से मदद करने में विश्वास नहीं रखता। हां, जब कभी गांव जाता है तो उसके माता—पिता को चौड़ा होकर बता आता है कि उसने एक बड़े अलभ्य शहर में उनके बेटे को आश्रय दिया हुआ है, वरना शहर में किराए का मकान लेने में अच्छे—भले खाते—पीते लोगों के भी छक्के छूट जाते हैं। उधर माता—पिता कृतज्ञता से दबे जाते हैं, इधर वह सोचता रहता है कि कैसे संवेदनाशून्य और स्वा​र्थी आदमी के साथ रहने के लिए वह विवश है। भाई ने उसे नौकर बनाकर रख दिया है। सुबह चाय से लेकर रात के खाने तक सारा काम उसके जिम्मे है।

गांव के समीप ही जिले के कॉलेज से ग्रेजुएट होकर वह यहां नौकरी की तलाश में आ गया था। अभी तक कहीं कोई नौकरी नहीं मिली थी और भाई की नौकरी से अब वह तंग आ चुका था। कई बार इच्छा होती कि गांव लौट जाए, पर वहां भी करेगा क्या वह? खेतों का काम तो उससे होने से रहा। शुरू से ही अच्छी नौकरी के ख़्वाब में वह जीता आया था।

उसने अपने लिए चाय नहीं बनायी। थका—थका एक कप चाय बनाकर भाई साहब को दूसरे कमरे में थमा आया था। उसने कहा भी कि रात में सांस की तकलीफ होने के कारण वह ठीक तरह से सो नहीं पाया है और इस समय कुछ देर सोना चाहता है। वे उसी तरह संवेदनाशून्य रहे। अखबार से एक बार नज़रें उठाकर उसकी ओर देखा और औपचारिकता निभायी——

‘अस्पताल में दिखा आना था।’

अस्पताल भी जाना है। उसे ख्याल आया। उर्वशी ने भी सलाह दी थी। पर इस समय वह कुछ देर अपने बिस्तर लेटेगा, भले ही नींद न आए।

तकरीबन साढ़े नौ बजे उठकर वह अस्पताल की ओर चल पड़ा। वह अपने—आपको बहुत कमज़ोर महसूस कर रहा था। कमरे से बाहर निकलते ही उसकी निगाह सामने वाले मकान पर पड़ी, जहां बालकनी पर खड़ी एक लड़की उसे अक्सर दिखाई देती है। लड़की उसे अच्छी लगती है। उसने अपने—आपको स्मार्ट और स्वस्थ दिखाने का अभिनय किया। पता नहीं, उस लड़की ने कभी उसे ध्यान से देखा भी या नहीं? कभी उसके बारे में सोचा भी या नहीं? उसने अपने चेहरे पर प्रसन्नता की चमक लाने की कोशिश की, इसलिए कि वह न जाने कितनी बार उसके बारे में सोच चुका है।

अस्पताल में इस वक्त बहुत भीड़ थी । चारों ओर एक गहमागहमी—सी मची हुई थी। उसकी इच्छा कतई नहीं हो रही थी कि वह भी इस भीड़ का हिस्सा बने पर मजबूरन उसे भी अपनी बारी की प्रतीक्षा करनी थी। वह इत्मीनान से ओ.पी.डी. के बाहर एक बेंच पर अपने दोनों घुटने मोड़कर बैठ गया। इस तरह बैठने में उसे सुविधा महसूस हो रही थी।

यह अस्पताल है, इसलिए यहां बीमारियों, तरह—तरह के टेस्टों, डॉक्टरों, दु:ख—दर्द और चारों तरफ फैली हुई एक गंध की बात होती है। डॉक्टरों की लापरवाहियां, उनका अस्पताल में समय बिताने के लिए आना, सिफारिशी लोगों का ध्यान रखना, नर्सों से चक्कर ——इस तरह की ही बातें। बेंच पर उसकी बगल में बैठा व्यक्ति दूसरे से कह रहा था, ‘यहां घंटों इन्तजार करने से से अच्छा है कि शाम को डॉक्टर साब के बंगले में ही दिखा लें। फीस लेंगे, यही न। दवा तो वैसे भी अस्पताल से कोई मिलती नहीं है।’

दूसरा चुप रहा।

यहां सभी कष्ट के मारे थे, अपनी—अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हुए। उसे अपना कष्ट कुछ कम लगा। इस तरह वहां बैठे—बैठे उसे नींद के झोंके आने लगे। उसे बड़ा सुकून मिल रहा था, यह सोचकर कि अभी भी उसके लिए आक्सीजन वायुमंडल में है।

बारी आने पर वह नींद के फ़ासले से लौटा और डॉक्टर के केबिन में पहुंच गया। उसने उन्हें रात की घटना बता दी। डॉक्टर ने अपना आला उसकी छाती से लगाया और फिर बिना कुछ पूछे पर्ची पर दवा लिखने लगा—— ‘एस्थलीन फ़ोर एम.जी.,टी.डी.एस.,एमिनोफाइलिन टैब्…स्टीम इन्हेल…’

‘यह दवा लेते रहना और एक हफ्ते बाद दिखा जाना। गर्म पानी की भाप दिन में दो—तीन बार ज़रूर लेना। जल्दी आराम होगा।’

वह थका—थका—सा डॉक्टर के केबिन से बाहर निकला। उसे अपनी प्यारी नींद के खोने का बड़ा दु:ख हो रहा था। उस कमी को पूरा करने के लिए अस्पताल के अहाते में बनी दवा की दुकान से पर्ची में लिखी दवा खरीदकर वह पास के पार्क में चला गया। दिन के बारह बजने वाले थे। सुबह पाव रोटी और चाय मिले दूध के बाद उसने कुछ नहीं खाया था। कुछ खाने की इच्छा भी नहीं हुई थी। घर वह जाना नहीं चाहता था क्योंकि वहां शारीरिक आराम तो मिलेगा नहीं, मानसिक आराम से भी हाथ धोना पड़ेगा। उसके भाई ने दो बजे की पारी में काम पर जाना था। सुबह वह उनसे झूठ बोल आया था कि अस्पताल में डॉक्टर को दिखाकर एक नौकरी के बारे में बात करने के लिए वह कहीं जाएगा।

पार्क के समीप एक छायादार पेड़ के नीचे बैठे चाय वाले के पास चाय के साथ एक मट्ठी ली और चाय के अंतिम घूंट के साथ डॉक्टर द्वारा बतायी गई दवा हलक से उतार ली। फिर वह पार्क के अन्दर जाकर कोने में एक आम के पेड़ के नीचे लेट गया। उसे उम्मीद थी कि यहां उसे अच्छी नींद आएगी और वह अपनी भटकी नींद की कमी को यहां पूरा कर लेगा। पर उसे नींद नहीं आयी। कई बार कोशिश की पर नाकाम रहा। दरअसल सिर्फ अपने बिस्तर से ही उसकी जान—पहचान है जो उसे अंक में भर लेता है। मां की गोद का एहसास उसे नहीं है पर अपने बिस्तर में वह ऐसा ही कुछ एहसास पाता है।डालियों को हवा में झूलते और चिड़ियों की आवाज़ाही को देखते —देखते उसने पार्क में कुछ वक्त गुज़ारा। वहां उस समय स्कूल—कॉलेज के पढ़ाकू लड़के ही थे। वह वहां से उठा और घर की ओर लौट पड़ा। उसे भूख लग आयी थी। घर पर पहुंचकर बाहर लटके ताले को उसने चाभी से खोला। अन्दर जाकर वह सीधे रसोई तक पहुंचा और इधर—उधर झांका। शायद भाई साब खाना बनाकर उसके लिए भी छोड़ गए हों, पर वहां कुछ नहीं था ——एक डिब्बे में रात की दो बासी रोटियां पड़ी थीं।

रतन चंद ‘रत्नेश’, म0 नं0 1859, सेक्टर 7—सी, चंडीगढ़—160019 मोबाइल— 09417573357

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Posted by on 08/02/2017. Filed under कहानी. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.