या अल्लाह, इन्सानों को किसी मुफ़्लिस का जिगर दे

JAGDISH BALI

गुज़िश्ता चंद रोज किसी रिश्तेदार की शादी में शरीक होने जाना हुआ ! एक रात गुज़ारने के वास्ते किसी के घर जाना हुआ ! उस श्क्स का तारीक सा मकान था, परिवार खासा बडा है, बामुशिक्ल गुज़ारा होता होगा ! जब सवेरे चलने को हुए तो उस शक्स की बिवी ने मेरी बेगम के बडे से बेग में एक पोटली डाल दी ! हम जिस गाडी में सफ़र कर रहे थे, उस घर की बूढी दादी हमारे साथ हमें छोडने आयी ! जरा सा सफ़र तय करने के बाद दादी मां ने कहा : थोडा रुको, मैं अभी आती हूं !” कुछ मिन्टों बाद वो आयी, हाथ में पतली-२ लकडियों का एक छोटा सा गट्ठा भी था और कहने लगी : ” बेटा ये गिलोई है, कई बिमारियों से निज़ात दिलाएगी !” फ़िर हमें खुदाहाफ़िज़ कह कर वो अपने घर लौट गयी ! सफ़र में सोचता रहा पोटली में क्या होगा ! घर पहूंचे, बैग कंधे से उतारा और पोटली टटोली ! राजमहा की दाल थी, दो-तीन वक्त का जुगाड ज़रूर था ! मैं चुप चाप अपने आपको देख रहा था और आंखों से अश्क रवां थे ! हम सब कुछ होते हुए भी वो चीज़ देते हैं जिन्हें हम फ़ालतू कहते हैं और इस मुफ़लिसी में भी वो वो चीज़ दे गया जिसके लिए उस्ने ताउम्र जदोजहद की है ! हम किसी को कपडा भी तब देने की सोचते हैं जब वो हमारे पहनने के काबिल नहीं रहता ! अमूनन अदीब लोग जिन्दगी में जमा-वाहिद, फ़यदा नुकसान की बहुत सोचते हैं लेकिन गरीब की ज़िन्दगी में मोहब्बत और दिल का मकाम बहुत ऊंचा होता है ! वो सीधा जीना जनते हैं और जहां तक शायद अमीर लोगों के दिल का रास्ता नहीं जाता ! सामान तो हम दुकान से खरीद सकते हैं पर मोहब्ब्त और परोपकार तिजारत नहीं जो दुकानों में मिल जाए ! उस राजमहा की दाल में जो प्रेम का स्वाद है वो खरीदी दाल में कहां क्योंकि वो तो तोल-मोल कर ली गयी है ! उस गिलोई में जो दवा है उसका सामी किसी हकीम के पास कहां ! मेरी नम आंखें शायद उस गरीब इन्सान का एहसान न चुका सके पर मैं ये दुआ जरूर करता हूं- या अल्लाह, इन्सानों को किसी मुफ़्लिस का जिगर दे क्योंकि वहां तेरा ठिकाना है ! 

Posted by JAGDISH BALI 

 

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Posted by on 08/02/2017. Filed under विविध. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.