ननु ताकती है दरवाज़ा

सीधे सादे शब्दों में मासूम चेहरों की चिंता करती कविताएं

                       कविता की रचना के लिए कवि का अपने आसपास के समाज से जुड़ाव जरूरी है। इतना ही नहीं समाज में मनुष्यों से इतर जीवों यहां तक की निर्जीव वस्तुओं के प्रति भी कवि सोचता है और उनसे हो रहे अन्याय उपेक्षा को अपनी रचनाओं के विषय बनाता है। कवि हर समय अपने आसपास के जीव निर्जीव संसार के प्रति संवेदनात्मक भाव से दृष्टि रखता है । उसका असंतोष उसकी रचना के लिए खाद पानी का जरिया है। दुनिया को और बेहतर और रहने लायक देखने की उसकी ये चाह उससे बेहतर कविताएं लिखवाती है।                  वह अपने आसपास के हर अन्याय का विरोध अपनी कविताओं में स्पष्ट अथवा अस्पष्ट तरीके से करता है। मनुष्य में बढ़ते स्वार्थ व आगे बढ़ने के लिए आजकल मनुष्य  दूसरों की ही नहीं अपने सगों की भी उपेक्षा वह कर जाता है । कवि मनुष्य  से ही नहीं कभी न दिखाई देने वाले ईश्‍वर के अलावा आसमान पर चमकते सूरज हवा में उड़ने वाले बादलों तक से शिकायत करता है।

 वह चाहता है दुनिया की हर नेमत सबको बराबर मिले। वह मासूम और भोले भाले लोगों के पक्ष में हमेक्षा खड़ा रहता हैं बाहरी दुनिया के अलावा कवि के भीतर की अपनी उथल पुथल भी है जिसमें उसका अपना निजी जीवन जिसमें प्रेम कुंठा उदासी सहित कई भाव है वे भी उसकी कविता रचना में शामिल होते है। हर कवि की कोई रचना किसी न किसी पाठक को अपने से जरूर जोड़ती है।                       इस साल सितम्बर में रौशन जसवाल विक्षिप्त का पहला काव्य संग्रह ननु ताकती है दरवाज़ा आया है। रौशन पिछले चार दशकों से कविता से जुड़े रहे है। सर्जक सहित प्रदेश में कविता के विभिन्न मंचों पर उनकी कविता अक्सर सुनी जाती रही है। इस दौरान उन्होंने कई कविताएं रची है जिनमें से 64 कविताओं का ये पहला संग्रह आया है। इन कविताओं में कवि ने बड़ी बड़ी बातों को छोड़ कर सीधी सादी भाषा और भावों के जरिए अपनी बात कही है।

               संग्रह की अधिकतर कविताएं मासूम लोगों बच्चों ग्रामिणों मजदूरों पहाड़ों  पगडडियों शोषण के आसपास की सांसे लेती नज़र आती है। इन कविताओं में कवि की कविता शैली भाषा पर कवि की बात जो वह कहना चाहता है को समझना जरूरी है।  इन कविताओं में कवि शहर और गांव के बीच पिसते आदमी की व्यथा सुना रहा है। माठु कविता के जरिए कवि गांव में अनपढ़ व्यक्ति के शोषण की बात करते हुए अन्याय से जूझने के लिए प्रेरित करता है तो अपनी जमीन अपने लोग कविता के जरिए कवि गांव और शहरों की एक होती स्थिति पर चिंतित है।  संग्रह की शीर्षक कविता ननु ताकती है दरवाज़ा के जरिए कवि नए समाज की भाग दौड़ भरी जिन्दगी में अकेले पड़ते बच्चों के एकाकीपन की बात करते हुए समाज को  सचेत करने की कोशिश करते हुए कहता है –

आसान नहीं है ननु बनना

             ननु बनने के लिए

             दोस्त बनाने पड़ते है

             खामोशी और एकाकीपन ।

संग्रह की वादें कविता के जरिए कवि शिक्षित हो चुके व्यक्ति के अपने गांव अपने लोगों के प्रति उत्तरदायित्व को भूल कर दुनिया की चकाचौंध में व्यस्त हो जाने की विडंबना दिखाई देती है। समाज के निम्नतर होने का दर्द भी कवि की कई कविताओं में नज़र आता है। संग्रह की कई छोटी कविताएं ढोल, चेहरा, धूप, हंसी लोग इत्यादि  कविताएं भी कवि के समाज के प्रति सरोकारों को दर्शाती है। हालांकि कुछ कविताओं में कवि थोड़ा और परिश्रम करके उन्हे बेहतर रूप दे सकता था। रौशन जसवाल अध्यापन से पिछले तीन दशकों से जुड़े है और उनकी आने वाली कविताओं में उनके इस क्षेत्र के अनुभवों से उपजने वाली कविताओं का भी इंतजार रहेगा। हिमाचल की कविता धारा में किसी भी नए कविता संग्रह का स्वागत तो होना ही चाहिए। बेशक उसमें कुछ कमियां भी रही हो। इससे कविता का संसार और समृद्ध ही होगा।

  • मोहन साहिल

पत्रकार

ठियोग जिला शिमला                  मोबाईल 98170 18052

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Posted by on 31/12/2016. Filed under पुस्‍तकें. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.