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लघुकथा शोर -रजनीकांत

वे दिन भी कितने अलौकिक होते थे। जब हम बच्चे गाँव में धमाचौकड़ी मचाते। दो महीनों की छुट्टियों में सभी बच्चे इकट्ठे होते। आमों के पेड़ पर आम खूब लगते। रसदार आम। पीले पीले आम ,हरे हरे आम। उन दिनों आम भी खूब लगते।मकान के सभी कमरे आमों से भरे होते।सभी बच्चे बनायन डाले बाल्टियों […]

अनपढ़ –       रतन चंद ‘रत्नेश’

अनपढ़ – रतन चंद ‘रत्नेश’

अपनी कोठी में कुछ काम कराने के लिए बाबू रामदयाल पास ही के चौराहे से एक मजदूर को पकड़ लाए। वह एक लुंगी और पुराने, जगह-जगह से पैबंद कुरते में था। बाबू रामदयाल उसे लेकर पैदल ही आ रहे थे। उन्होंने पूछा, ‘‘क्या नाम है तेरा?’’ ‘‘जी बाबू…. सुखी राम।’’ बाबू रामदयाल मन-ही-मन मुस्कुराए, उसके […]

मोटर साइकिल — पंकज वर्मा

मोटर साइकिल — पंकज वर्मा

बड़े गुस्से से मैं घर से चला आया ..इतना गुस्सा था की गलती से पापा के ही जूते पहन के निकल गयामैं आज बस घर छोड़ दूंगा, और तभी लौटूंगा जब बहुत बड़ा आदमी बन जाऊंगा …जब मोटर साइकिल नहीं दिलवा सकते थे, तो क्यूँ इंजीनियर बनाने के सपने देखतें है …..आज मैं पापा का […]