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सवर्ण देवता दलित देवता [कहानी] – एस आर हरनोट

सवर्ण देवता दलित देवता [कहानी] – एस आर हरनोट

मैं तकरीबन आधी रात को लौट आया। यह लौटना अत्यन्त तकलीफ देह और अप्रत्याशित था। मेरे पास न तो कोई रोशनी का प्रबन्ध था और न ही किसी घर से रोशनी मांगने की होश ही रही। विचलित मन। आक्रोश और भय से मिश्रित। चार-पांच किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ने के बाद सीधे रास्ते में पहुंचा तो […]

रातरानी का खिला हुआ चेहरा —- कहानी -रतन चंद ‘रत्नेश’

उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि कोई छाती पर बैठा उसकी गर्दन धीरे—धीरे दबाए जा रहा है। आंख खुली तो सांस घुटती नज़र आई और फेफड़े हवा के लिए फड़ाफड़ा रहे थे। उस फड़फड़ाहट से सारा कमरा गूँज  रहा था। पर्याप्त हवा होते हुए भी उसके फेफड़े सांस लेने और छोड़ने के लिए जद्दोजहद […]

लघुकथा शोर -रजनीकांत

वे दिन भी कितने अलौकिक होते थे। जब हम बच्चे गाँव में धमाचौकड़ी मचाते। दो महीनों की छुट्टियों में सभी बच्चे इकट्ठे होते। आमों के पेड़ पर आम खूब लगते। रसदार आम। पीले पीले आम ,हरे हरे आम। उन दिनों आम भी खूब लगते।मकान के सभी कमरे आमों से भरे होते।सभी बच्चे बनायन डाले बाल्टियों […]

अनपढ़ –       रतन चंद ‘रत्नेश’

अनपढ़ – रतन चंद ‘रत्नेश’

अपनी कोठी में कुछ काम कराने के लिए बाबू रामदयाल पास ही के चौराहे से एक मजदूर को पकड़ लाए। वह एक लुंगी और पुराने, जगह-जगह से पैबंद कुरते में था। बाबू रामदयाल उसे लेकर पैदल ही आ रहे थे। उन्होंने पूछा, ‘‘क्या नाम है तेरा?’’ ‘‘जी बाबू…. सुखी राम।’’ बाबू रामदयाल मन-ही-मन मुस्कुराए, उसके […]

मोटर साइकिल — पंकज वर्मा

मोटर साइकिल — पंकज वर्मा

बड़े गुस्से से मैं घर से चला आया ..इतना गुस्सा था की गलती से पापा के ही जूते पहन के निकल गयामैं आज बस घर छोड़ दूंगा, और तभी लौटूंगा जब बहुत बड़ा आदमी बन जाऊंगा …जब मोटर साइकिल नहीं दिलवा सकते थे, तो क्यूँ इंजीनियर बनाने के सपने देखतें है …..आज मैं पापा का […]

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ननु ताकती है दरवाज़ा

ननु ताकती है दरवाज़ा

सीधे सादे शब्दों में मासूम चेहरों की चिंता करती कविताएं                        कविता की रचना के लिए कवि का अपने आसपास के समाज से जुड़ाव जरूरी है। इतना ही नहीं समाज में मनुष्यों से इतर जीवों यहां तक की निर्जीव वस्तुओं के प्रति भी कवि सोचता है और उनसे हो रहे अन्याय उपेक्षा को अपनी रचनाओं […]

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